Yakshini Mantra List
यक्षिणी मंत्र साधना Yakshini Sadhana
यक्षिणियों मे ऊर्जा की अपार क्षमता होती है । वह प्रसन्न होने पर कुछ भी प्रदान कर सकती हैं ।
भौतिक सिद्धि एवं समृद्धि के लिए तथा अन्य अनेक समस्याओं के समाधान के निमित्त भी यक्षिणी साधना निश्चित रुपेण फलदायी होती है ।
यक्ष और यक्षिणी : यक्ष की स्त्रियों को यक्षिणियां कहते हैं। ये भी कई प्रकार के होते हैं जो भूमि में गड़े हुए खजाने आदि के रक्षक हैं, इन्हें निधि पति भी कहा जाता हैं।
इनके सर्वोच्च स्थान पर निधि पति ‘कुबेर’ विराजित हैं तथा देवताओं के निधि के रक्षक हैं।
चमत्कारिक अष्ट यक्षिणियों की साधना, तुरंत मिलेगा फल ये देहधारी होते हुए भी सूक्ष्म रूप से युक्त होकर जहां चाहे वहां विचरण कर सकते हैं।
इनका प्रमुख कर्म धन से संबंधित हैं, ये गुप्त धन या निधियों की रक्षा करते हैं तथा समृद्धि, वैभव, राज पाट के स्वामी हैं। आदि काल से ही, मनुष्य धन से सम्पन्न होने हेतु, अपने धन की रक्षा हेतु, यक्षों की अराधना करते आए हैं।
भिन्न-भिन्न यक्षों की प्राचीन पाषाण प्रतिमा भारत के विभिन्न संग्रहालयों में आज भी सुरक्षित हैं, जो खुदाई से प्राप्त हुए हैं।
तंत्रो के अनुसार, रतिप्रिया यक्षिणी, साधक से संतुष्ट होने पर 25 स्वर्ण मुद्राएं प्रदान करती हैं।
इसी तरह सुसुन्दरी यक्षिणी, धन तथा संपत्ति सहित, पूर्णायु, अनुरागिनी यक्षिणी, 1000 स्वर्ण मुद्राएं, जलवासिनी यक्षिणी, भिन्न प्रकार के नाना रत्नों को, वटवासिनी यक्षिणी, नाना प्रकार के आभूषण तथा वस्त्र को प्रदान करती हैं। तंत्र ग्रंथों में यक्षिणी तथा यक्ष के साधना के विस्तृत विवरण मिलते हैं।
प्रमुख यक्षिणियां है –
1. सूरसुन्दरी यक्षिणी,
2. मनोहरिणी यक्षणी Manoharini Yakshini
3. कनकवती यक्षिणी KanakVati
4. कामेश्वरी यक्षिणी ,
5. रतिप्रिया RatiPriya Yakshini,
6. पद्मिनी यक्षिणी Padmini,
7. नदी यक्षिणी और .
8- अनुरागिनी यक्षिणी AnuRagini।
यक्षिणी को मंत्र साधना द्वारा जाग्रत कर बुलाया जाता है ,यह कई प्रकार की इच्छाओ की पूर्ति करती हैं , यक्षिणी कई प्रकार की होती है और उन का महत्व भी भिन्न भिन्न प्रकार का होता है।
जिसमें धन प्राप्त करने के लिए स्वर्ण यक्षिणी बहुत ही महत्वपूर्ण हैं.
* स्वर्ण यक्षिणी Gold Yakshini
1- चण्डवेगा यक्षिणी : दिव्य रसायन पूर्ति। 2- विशाला यक्षिणी : दिव्य रसायन।
3- लक्ष्मी यक्षिणी : दिव्य रसायन देने वाली। ऐश्वर्य प्रदान करने वाली
4- काल कर्णिका यक्षिणी : ऐश्वर्य प्रदान करने वाली। 5- शोभना यक्षिणी : भोग और कामना पूर्ति करने वाली।
6- दिव्य अंजन प्रदान करने वाली यक्षिणी
7- वटवासिनी यक्षिणी : वस्त्र, अलंकार और दिव्यंजन साधक को प्रदान करती है।
8- हंसी यक्षिणी : पृथ्वी में गड़ा धन दिखाने वाले अंजन की पूर्ति करने वाली।
9- नटी यक्षिणी: अंजन और दिव्य भोग प्रदान करने वाली।
10- विभ्र्मा यक्षिणी
11- रति प्रिया यक्षिणी: धन धन्य से भरपूर करने वाली यक्षिणी।
12- सूरसुन्दरी यक्षिणी : धन और दीर्घायु की पूर्ति हेतु।
13- अनुरागिणी यक्षिणी : स्वर्ण मुद्रा से इच्छापूर्ति करने वाली।
14- जलवासिनी यक्षिणी : उत्तम कोटि की रत्न इच्छा पूर्ति करती है।
15- महाभया यक्षिणी : सभी प्रकार के रत्न प्रदान करने वाली।
16- चन्द्रिका यक्षिणी :अमृत प्राप्ति के लिए।
17- रक्तकम्बला यक्षिणी : मृत में प्राण डालने वाली और मूर्तियों को चालयमान करने वाली।
18 – विधुजिव्हा यक्षिणी : भूत वर्तमान और भविष्य का ज्ञान बताने वाली।
19- कर्णपिशाचिनी यक्षिणी : समाचार देने वाली ( काल ज्ञान )
20- चामुंडा यक्षिणी :
21- चिंचीपिशाची यक्षिणी : स्वपन में कालज्ञान देने वाली यक्षिणी।
22- विचित्रा यक्षिणी : मनवांछित फल प्रदान करने वाली।
23- पद्मिनी यक्षिणी: दिव्य भोग और रत्न प्रदान करने वाली।
यक्षिणियां अत्यंत कम समय में ही भौतिक व आर्थिक रूप से अपेक्षित परिणाम देकर भौतिक सुख संसाधनों की सहजता प्रदान करती हैं , साथ ही साधक द्वारा उनकी शक्तियों का सही प्रयोग किये जाने पर आध्यात्म के मार्ग में भी सहायक होती हैं ! प्रतेक यक्षिणी के अलग अलग मंत्र होते हैं ओर अलग मंत्र विधि द्वारा बुलाया जाता है। मंत्र साधना के लिए कोटेक्ट करें यक्षिणी मंत्र साधना यक्षिणियों को सिद्घ करने केलिये मंत्र सिद्ध यक्षिणी माला यंत्र लेकर साधना करें .
यक्षिणीयों के नाम एवं मंत्र
1- विद्या यक्षिणी – ह्रीं वेदमातृभ्यः स्वाहा ।
2- कुबेर यक्षिणी – ॐ कुबेर यक्षिण्यै धनधान्यस्वामिन्यै धन – धान्य समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा । 2- जनरंजिनी यक्षिणी – ॐ क्लीं जनरंजिनी स्वाहा । 3- चंद्रिका यक्षिणी – ॐ ह्रीं चंद्रिके हंसः क्लीं स्वाहा । 4- घंटाकर्णी यक्षिणी – ॐ पुरं क्षोभय भगवति गंभीर स्वरे क्लैं स्वाहा । 5- शंखिनी यक्षिणी – ॐ शंखधारिणी शंखाभरणे ह्रां ह्रीं क्लीं क्लीं श्रीं स्वाहा । 6- कालकर्णी यक्षिणी – ॐ क्लौं कालकर्णिके ठः ठः स्वाहा । 7- विशाला यक्षिणी – ॐ ऐं विशाले ह्रां ह्रीं क्लीं स्वाहा । 8- मदना यक्षिणी – ॐ मदने मदने देवि ममालिंगय संगं देहि देहि श्रीः स्वाहा । 9- श्मशानी यक्षिणी – ॐ हूं ह्रीं स्फूं स्मशानवासिनि श्मशाने स्वाहा । 10- महामाया यक्षिणी – ॐ ह्रीं महामाये हुं फट् स्वाहा । 11 भिक्षिणी यक्षिणी – ॐ ऐं महानादे भीक्षिणी ह्रां ह्रीं स्वाहा । 12- माहेन्द्री यक्षिणी – ॐ ऐं क्लीं ऐन्द्रि माहेन्द्रि कुलुकुलु चुलुचुलु हंसः स्वाहा । 13- विकला यक्षिणी – ॐ विकले ऐं ह्रीं श्रीं क्लैं स्वाहा । 14- कपालिनी यक्षिणी – ॐ ऐं कपालिनी ह्रां ह्रीं क्लीं क्लैं क्लौं हससकल ह्रीं फट् स्वाहा । 15- सुलोचना यक्षिणी – ॐ क्लीं सुलोचने देवि स्वाहा । 16- पदमिनी यक्षिणी – ॐ ह्रीं आगच्छ पदमिनि वल्लभे स्वाहा । 17- कामेश्वरी यक्षिणी – ॐ ह्रीं आगच्छ कामेश्वरि स्वाहा । 18 – मानिनी यक्षिणी – ॐ ऐं मानिनि ह्रीं एहि एहि सुंदरि हस हसमिह संगमिह स्वाहा । 19- शतपत्रिका यक्षिणी – ॐ ह्रां शतपत्रिके ह्रां ह्रीं श्रीं स्वाहा । 20- मदनमेखला यक्षिणी – ॐ क्रों मदनमेखले नमः स्वाहा । 21- प्रमदा यक्षिणी – ॐ ह्रीं प्रमदे स्वाहा । 22- विलासिनी यक्षिणी – ॐ विरुपाक्षविलासिनी आगच्छागच्छ ह्रीं प्रिया मे भव क्लैं स्वाहा । 23- मनोहरा यक्षिणी – ॐ ह्रीं आगच्छ मनोहरे स्वाहा । 24- अनुरागिणी यक्षिणी – ॐ ह्रीं आगच्छानुरागिणी मैथुनप्रिये स्वाहा । 25- चंद्रद्रवा यक्षिणी – ॐ ह्रीं नमश्चंद्रद्रवे कर्णाकर्णकारणे स्वाहा । 26- विभ्रमा यक्षिणी – ॐ ह्रीं विभ्रमरुपे विभ्रमं कुरु कुरु एहि एहि भगवति स्वाहा । 27 वट यक्षिणी – ॐ एहि एहि यक्षि यक्षि महायक्षि वटवृक्ष निवासिनी शीघ्रं मे सर्व सौख्यं कुरु कुरु स्वाहा । 28- सुरसुंदरी यक्षिणी – ॐ आगच्छ सुरसुंदरि स्वाहा । 29- कनकावती यक्षिणी – ॐ कनकावति मैथुनप्रिये स्वाहा ।
यक्षिणी मंत्र साधना अनुरागिणी यक्षिणी :
यह यक्षिणी यदि साधक पर प्रसंन्न हो जाए तो वह उसे नित्य धन, मान, यश आदि से परिपूर्ण तृप्त कर देती है।
अनुरागिणी यक्षिणी शुभ्रवर्णा है और यह साधक की इच्छा होने पर उसके साथ रास-उल्लास भी करती है। साधना के लिए सहायक यंत्र ओर मंत्र सिद्ध माला ले.ले इस यक्षिणी को सिद्ध करने का मंत्र : ॐ ह्रीं अनुरागिणी आगच्छ स्वाहा ॥
साधना की तैयारी: यह साधना घर में नहीं किसी एकांत स्थान पर करना होती है, जहां कोई विघ्न न डाले। उक्त साधना नित्य रात्रि में की जाती है। साधना के पहले उक्त यक्षिणी का चित्र साधना स्थल पर लगा दें। साधना काल में किसी भी प्रकार की अनुभूति हो तो उसे किसी को बताना नहीं चाहिए। हवन और पूजा की संपूर्ण सामग्री एकत्रीत कर लें। साधान स्थल पर पर्याप्त भोजन, पानी और अन्य प्रकार की दैनिक जरूरत की व्यवस्था करके रखें ताकी साधन छोड़कर कहीं जाना न पड़े। साधना की विधि : भोजपत्र पर लाल चंदन से अनार की कलम द्वारा किसी शुभ मुहूर्त में उस उक्त यक्षिणी का नाम लिखकर उसे आसन पर प्रतिष्ठत करने का उचित रीति से आह्वान करके उनकी पूजा करें। उसके बाद उपरोक्त मंत्र का जप आरंभ करें। कम से कम 10 हजार और ज्यादा से ज्यादा 1 लाख तक का जप का संकल्प लेकर ही जप करें। जितने भी संख्या का जप का संकल्प लिया है उतना जप करने के बाद कम से कम 1008 बार हवन में आहुति देकर हवन करें। जप और हवन समाप्त होने के बाद वहीं सो जाएं। यह साधना की संक्षिप्त विधि है। यक्षणि कवच नायिका कवच को यक्षिणी पुजा से पहले 1,5 या 7 बार जप किया जाना चाहिए। इस कवच के जप से किसी भी प्रकार की सुन्दरी साधना में विपरीत परिणाम प्राप्त नहीं होते और साधना में जल्द ही सिद्धि प्राप्त होती हैं। हम आशा करते हैं कि जब भी आप कोई भी यक्षिणी साधना करोगें तो इस कवच का जप अवश्य करोगें। इस कवच के जप से समस्त प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली यक्षिणी साधक के नियंत्रण मे आ जाती हैं और साधक के सभी मनोरथो को पूर्ण करती हैं।
यक्षिणी साधना से जुडा यह कवच अपने आप मे दुर्लभ हैं। इस कवच के जपने से यक्षिणीयों का वशीकरण होता हैं। तो क्या सोच रहे हैं आप…………………… ।। श्री उन्मत्त-भैरव उवाच ।। श्रृणु कल्याणि ! मद्-वाक्यं, कवचं देव-दुर्लभं। यक्षिणी-नायिकानां तु, संक्षेपात् सिद्धि-दायकं ।। ज्ञान-मात्रेण देवशि ! सिद्धिमाप्नोति निश्चितं। यक्षिणि स्वयमायाति, कवच-ज्ञान-मात्रतः ।। सर्वत्र दुर्लभं देवि ! डामरेषु प्रकाशितं। पठनात् धारणान्मर्त्यो, यक्षिणी-वशमानयेत् ।। विनियोगः- ॐ अस्य श्रीयक्षिणी-कवचस्य श्री गर्ग ऋषिः, गायत्री छन्दः, श्री अमुकी यक्षिणी देवता, साक्षात् सिद्धि-समृद्धयर्थे पाठे विनियोगः। ऋष्यादिन्यासः- श्रीगर्ग ऋषये नमः शिरसि, गायत्री छन्दसे नमः मुखे, श्री रतिप्रिया यक्षिणी देवतायै नमः हृदि, साक्षात् सिद्धि-समृद्धयर्थे पाठे विनियोगाय नमः सर्वांगे। ।। मूल पाठ ।। शिरो मे यक्षिणी पातु, ललाटं यक्ष-कन्यका। मुखं श्री धनदा पातु, कर्णौ मे कुल-नायिका ।। चक्षुषी वरदा पातु, नासिकां भक्त-वत्सला। केशाग्रं पिंगला पातु, धनदा श्रीमहेश्वरी ।। स्कन्धौ कुलालपा पातु, गलं मे कमलानना। किरातिनी सदा पातु, भुज-युग्मं जटेश्वरी ।। विकृतास्या सदा पातु, महा-वज्र-प्रिया मम। अस्त्र-हस्ता पातु नित्यं, पृष्ठमुदर-देशकम् ।। भेरुण्डा माकरी देवी, हृदयं पातु सर्वदा। अलंकारान्विता पातु, नितम्ब-स्थलं दया ।। धार्मिका गुह्यदेशं मे, पाद-युग्मं सुरांगना। शून्यागारे सदा पातु, मन्त्र-माता-स्वरुपिणी ।। निष्कलंका सदा पातु, चाम्बुवत्यखिलं तनुं। प्रान्तरे धनदा पातु, निज-बीज-प्रकाशिनी ।। लक्ष्मी-बीजात्मिका पातु, खड्ग-हस्ता श्मशानके। शून्यागारे नदी-तीरे, महा-यक्षेश-कन्यका।। पातु मां वरदाख्या मे, सर्वांगं पातु मोहिनी। महा-संकट-मध्ये तु, संग्रामे रिपु-सञ्चये ।। क्रोध-रुपा सदा पातु, महा-देव निषेविका। सर्वत्र सर्वदा पातु, भवानी कुल-दायिका ।। इत्येतत् कवचं देवि ! महा-यक्षिणी-प्रीतिवं। अस्यापि स्मरणादेव, राजत्वं लभतेऽचिरात्।। पञ्च-वर्ष-सहस्राणि, स्थिरो भवति भू-तले। वेद-ज्ञानी सर्व-शास्त्र-वेत्ता भवति निश्चितम्। अरण्ये सिद्धिमाप्नोति, महा-कवच-पाठतः। यक्षिणी कुल-विद्या च, समायाति सु-सिद्धदा।। अणिमा-लघिमा-प्राप्तिः सुख-सिद्धि-फलं लभेत्। पठित्वा धारयित्वा च, निर्जनेऽरण्यमन्तरे।। स्थित्वा जपेल्लक्ष-मन्त्र मिष्ट-सिद्धिं लभेन्निशि। भार्या भवति सा देवी, महा-कवच-पाठतः।। ग्रहणादेव सिद्धिः स्यान्, नात्र कार्या विचारणा ।। ।। ॐ तत्सत ।। Guleria FB Contact Yakshini Yogini FB Apsara Mantra Yogini Mantra Das Mahavidhya Inder Dev Nagini Mantra Kundalini Mantra Mantra Knowledge
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- सामान्य यक्षिणी साधना – यज्ञ विधान दिक्षायक्षिणी दिक्षा व हवन यज्ञ यक्षिणी साधना अत्यन्त ही सरल पुर्णतः सात्विक व सुरक्षित साधना होती है ।जिसे कोई भी साधक सक्षम गुरु से विधिवत दीक्षा लेकर गुरु के निर्देशानुसार गुरु के सानिध्य में आसानीContinue reading “सामान्य यक्षिणी साधना – यज्ञ विधान दिक्षा”
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यक्षिणी मंत्र साधना Yakshini Sadhana
यक्षिणियों मे ऊर्जा की अपार क्षमता होती है । वह प्रसन्न होने पर कुछ भी प्रदान कर सकती हैं ।
भौतिक सिद्धि एवं समृद्धि के लिए तथा अन्य अनेक समस्याओं के समाधान के निमित्त भी यक्षिणी साधना निश्चित रुपेण फलदायी होती है ।
यक्ष और यक्षिणी : यक्ष की स्त्रियों को यक्षिणियां कहते हैं। ये भी कई प्रकार के होते हैं जो भूमि में गड़े हुए खजाने आदि के रक्षक हैं, इन्हें निधि पति भी कहा जाता हैं।
इनके सर्वोच्च स्थान पर निधि पति ‘कुबेर’ विराजित हैं तथा देवताओं के निधि के रक्षक हैं।
चमत्कारिक अष्ट यक्षिणियों की साधना, तुरंत मिलेगा फल ये देहधारी होते हुए भी सूक्ष्म रूप से युक्त होकर जहां चाहे वहां विचरण कर सकते हैं।
इनका प्रमुख कर्म धन से संबंधित हैं, ये गुप्त धन या निधियों की रक्षा करते हैं तथा समृद्धि, वैभव, राज पाट के स्वामी हैं। आदि काल से ही, मनुष्य धन से सम्पन्न होने हेतु, अपने धन की रक्षा हेतु, यक्षों की अराधना करते आए हैं।
भिन्न-भिन्न यक्षों की प्राचीन पाषाण प्रतिमा भारत के विभिन्न संग्रहालयों में आज भी सुरक्षित हैं, जो खुदाई से प्राप्त हुए हैं।
तंत्रो के अनुसार, रतिप्रिया यक्षिणी, साधक से संतुष्ट होने पर 25 स्वर्ण मुद्राएं प्रदान करती हैं।
इसी तरह सुसुन्दरी यक्षिणी, धन तथा संपत्ति सहित, पूर्णायु, अनुरागिनी यक्षिणी, 1000 स्वर्ण मुद्राएं, जलवासिनी यक्षिणी, भिन्न प्रकार के नाना रत्नों को, वटवासिनी यक्षिणी, नाना प्रकार के आभूषण तथा वस्त्र को प्रदान करती हैं। तंत्र ग्रंथों में यक्षिणी तथा यक्ष के साधना के विस्तृत विवरण मिलते हैं।
प्रमुख यक्षिणियां है –
1. सूरसुन्दरी यक्षिणी,
2. मनोहरिणी यक्षणी Manoharini Yakshini
3. कनकवती यक्षिणी KanakVati
4. कामेश्वरी यक्षिणी ,
5. रतिप्रिया RatiPriya Yakshini,
6. पद्मिनी यक्षिणी Padmini,
7. नदी यक्षिणी और .
8- अनुरागिनी यक्षिणी AnuRagini।
यक्षिणी को मंत्र साधना द्वारा जाग्रत कर बुलाया जाता है ,यह कई प्रकार की इच्छाओ की पूर्ति करती हैं , यक्षिणी कई प्रकार की होती है और उन का महत्व भी भिन्न भिन्न प्रकार का होता है।
जिसमें धन प्राप्त करने के लिए स्वर्ण यक्षिणी बहुत ही महत्वपूर्ण हैं.
* स्वर्ण यक्षिणी Gold Yakshini
1- चण्डवेगा यक्षिणी : दिव्य रसायन पूर्ति। 2- विशाला यक्षिणी : दिव्य रसायन।
3- लक्ष्मी यक्षिणी : दिव्य रसायन देने वाली। ऐश्वर्य प्रदान करने वाली
4- काल कर्णिका यक्षिणी : ऐश्वर्य प्रदान करने वाली। 5- शोभना यक्षिणी : भोग और कामना पूर्ति करने वाली।
6- दिव्य अंजन प्रदान करने वाली यक्षिणी
7- वटवासिनी यक्षिणी : वस्त्र, अलंकार और दिव्यंजन साधक को प्रदान करती है।
8- हंसी यक्षिणी : पृथ्वी में गड़ा धन दिखाने वाले अंजन की पूर्ति करने वाली।
9- नटी यक्षिणी: अंजन और दिव्य भोग प्रदान करने वाली।
10- विभ्र्मा यक्षिणी
11- रति प्रिया यक्षिणी: धन धन्य से भरपूर करने वाली यक्षिणी।
12- सूरसुन्दरी यक्षिणी : धन और दीर्घायु की पूर्ति हेतु।
13- अनुरागिणी यक्षिणी : स्वर्ण मुद्रा से इच्छापूर्ति करने वाली।
14- जलवासिनी यक्षिणी : उत्तम कोटि की रत्न इच्छा पूर्ति करती है।
15- महाभया यक्षिणी : सभी प्रकार के रत्न प्रदान करने वाली।
16- चन्द्रिका यक्षिणी :अमृत प्राप्ति के लिए।
17- रक्तकम्बला यक्षिणी : मृत में प्राण डालने वाली और मूर्तियों को चालयमान करने वाली।
18 – विधुजिव्हा यक्षिणी : भूत वर्तमान और भविष्य का ज्ञान बताने वाली।
19- कर्णपिशाचिनी यक्षिणी : समाचार देने वाली ( काल ज्ञान )
20- चामुंडा यक्षिणी :
21- चिंचीपिशाची यक्षिणी : स्वपन में कालज्ञान देने वाली यक्षिणी।
22- विचित्रा यक्षिणी : मनवांछित फल प्रदान करने वाली।
23- पद्मिनी यक्षिणी: दिव्य भोग और रत्न प्रदान करने वाली।
यक्षिणियां अत्यंत कम समय में ही भौतिक व आर्थिक रूप से अपेक्षित परिणाम देकर भौतिक सुख संसाधनों की सहजता प्रदान करती हैं , साथ ही साधक द्वारा उनकी शक्तियों का सही प्रयोग किये जाने पर आध्यात्म के मार्ग में भी सहायक होती हैं ! प्रतेक यक्षिणी के अलग अलग मंत्र होते हैं ओर अलग मंत्र विधि द्वारा बुलाया जाता है। मंत्र साधना के लिए कोटेक्ट करें यक्षिणी मंत्र साधना यक्षिणियों को सिद्घ करने केलिये मंत्र सिद्ध यक्षिणी माला यंत्र लेकर साधना करें .
यक्षिणीयों के नाम एवं मंत्र
1- विद्या यक्षिणी – ह्रीं वेदमातृभ्यः स्वाहा ।
2- कुबेर यक्षिणी – ॐ कुबेर यक्षिण्यै धनधान्यस्वामिन्यै धन – धान्य समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा । 2- जनरंजिनी यक्षिणी – ॐ क्लीं जनरंजिनी स्वाहा । 3- चंद्रिका यक्षिणी – ॐ ह्रीं चंद्रिके हंसः क्लीं स्वाहा । 4- घंटाकर्णी यक्षिणी – ॐ पुरं क्षोभय भगवति गंभीर स्वरे क्लैं स्वाहा । 5- शंखिनी यक्षिणी – ॐ शंखधारिणी शंखाभरणे ह्रां ह्रीं क्लीं क्लीं श्रीं स्वाहा । 6- कालकर्णी यक्षिणी – ॐ क्लौं कालकर्णिके ठः ठः स्वाहा । 7- विशाला यक्षिणी – ॐ ऐं विशाले ह्रां ह्रीं क्लीं स्वाहा । 8- मदना यक्षिणी – ॐ मदने मदने देवि ममालिंगय संगं देहि देहि श्रीः स्वाहा । 9- श्मशानी यक्षिणी – ॐ हूं ह्रीं स्फूं स्मशानवासिनि श्मशाने स्वाहा । 10- महामाया यक्षिणी – ॐ ह्रीं महामाये हुं फट् स्वाहा । 11 भिक्षिणी यक्षिणी – ॐ ऐं महानादे भीक्षिणी ह्रां ह्रीं स्वाहा । 12- माहेन्द्री यक्षिणी – ॐ ऐं क्लीं ऐन्द्रि माहेन्द्रि कुलुकुलु चुलुचुलु हंसः स्वाहा । 13- विकला यक्षिणी – ॐ विकले ऐं ह्रीं श्रीं क्लैं स्वाहा । 14- कपालिनी यक्षिणी – ॐ ऐं कपालिनी ह्रां ह्रीं क्लीं क्लैं क्लौं हससकल ह्रीं फट् स्वाहा । 15- सुलोचना यक्षिणी – ॐ क्लीं सुलोचने देवि स्वाहा । 16- पदमिनी यक्षिणी – ॐ ह्रीं आगच्छ पदमिनि वल्लभे स्वाहा । 17- कामेश्वरी यक्षिणी – ॐ ह्रीं आगच्छ कामेश्वरि स्वाहा । 18 – मानिनी यक्षिणी – ॐ ऐं मानिनि ह्रीं एहि एहि सुंदरि हस हसमिह संगमिह स्वाहा । 19- शतपत्रिका यक्षिणी – ॐ ह्रां शतपत्रिके ह्रां ह्रीं श्रीं स्वाहा । 20- मदनमेखला यक्षिणी – ॐ क्रों मदनमेखले नमः स्वाहा । 21- प्रमदा यक्षिणी – ॐ ह्रीं प्रमदे स्वाहा । 22- विलासिनी यक्षिणी – ॐ विरुपाक्षविलासिनी आगच्छागच्छ ह्रीं प्रिया मे भव क्लैं स्वाहा । 23- मनोहरा यक्षिणी – ॐ ह्रीं आगच्छ मनोहरे स्वाहा । 24- अनुरागिणी यक्षिणी – ॐ ह्रीं आगच्छानुरागिणी मैथुनप्रिये स्वाहा । 25- चंद्रद्रवा यक्षिणी – ॐ ह्रीं नमश्चंद्रद्रवे कर्णाकर्णकारणे स्वाहा । 26- विभ्रमा यक्षिणी – ॐ ह्रीं विभ्रमरुपे विभ्रमं कुरु कुरु एहि एहि भगवति स्वाहा । 27 वट यक्षिणी – ॐ एहि एहि यक्षि यक्षि महायक्षि वटवृक्ष निवासिनी शीघ्रं मे सर्व सौख्यं कुरु कुरु स्वाहा । 28- सुरसुंदरी यक्षिणी – ॐ आगच्छ सुरसुंदरि स्वाहा । 29- कनकावती यक्षिणी – ॐ कनकावति मैथुनप्रिये स्वाहा ।
यक्षिणी मंत्र साधना अनुरागिणी यक्षिणी :
यह यक्षिणी यदि साधक पर प्रसंन्न हो जाए तो वह उसे नित्य धन, मान, यश आदि से परिपूर्ण तृप्त कर देती है।
अनुरागिणी यक्षिणी शुभ्रवर्णा है और यह साधक की इच्छा होने पर उसके साथ रास-उल्लास भी करती है। साधना के लिए सहायक यंत्र ओर मंत्र सिद्ध माला ले.ले इस यक्षिणी को सिद्ध करने का मंत्र : ॐ ह्रीं अनुरागिणी आगच्छ स्वाहा ॥
साधना की तैयारी: यह साधना घर में नहीं किसी एकांत स्थान पर करना होती है, जहां कोई विघ्न न डाले। उक्त साधना नित्य रात्रि में की जाती है। साधना के पहले उक्त यक्षिणी का चित्र साधना स्थल पर लगा दें। साधना काल में किसी भी प्रकार की अनुभूति हो तो उसे किसी को बताना नहीं चाहिए। हवन और पूजा की संपूर्ण सामग्री एकत्रीत कर लें। साधान स्थल पर पर्याप्त भोजन, पानी और अन्य प्रकार की दैनिक जरूरत की व्यवस्था करके रखें ताकी साधन छोड़कर कहीं जाना न पड़े। साधना की विधि : भोजपत्र पर लाल चंदन से अनार की कलम द्वारा किसी शुभ मुहूर्त में उस उक्त यक्षिणी का नाम लिखकर उसे आसन पर प्रतिष्ठत करने का उचित रीति से आह्वान करके उनकी पूजा करें। उसके बाद उपरोक्त मंत्र का जप आरंभ करें। कम से कम 10 हजार और ज्यादा से ज्यादा 1 लाख तक का जप का संकल्प लेकर ही जप करें। जितने भी संख्या का जप का संकल्प लिया है उतना जप करने के बाद कम से कम 1008 बार हवन में आहुति देकर हवन करें। जप और हवन समाप्त होने के बाद वहीं सो जाएं। यह साधना की संक्षिप्त विधि है। यक्षणि कवच नायिका कवच को यक्षिणी पुजा से पहले 1,5 या 7 बार जप किया जाना चाहिए। इस कवच के जप से किसी भी प्रकार की सुन्दरी साधना में विपरीत परिणाम प्राप्त नहीं होते और साधना में जल्द ही सिद्धि प्राप्त होती हैं। हम आशा करते हैं कि जब भी आप कोई भी यक्षिणी साधना करोगें तो इस कवच का जप अवश्य करोगें। इस कवच के जप से समस्त प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली यक्षिणी साधक के नियंत्रण मे आ जाती हैं और साधक के सभी मनोरथो को पूर्ण करती हैं।
यक्षिणी साधना से जुडा यह कवच अपने आप मे दुर्लभ हैं। इस कवच के जपने से यक्षिणीयों का वशीकरण होता हैं। तो क्या सोच रहे हैं आप…………………… ।। श्री उन्मत्त-भैरव उवाच ।। श्रृणु कल्याणि ! मद्-वाक्यं, कवचं देव-दुर्लभं। यक्षिणी-नायिकानां तु, संक्षेपात् सिद्धि-दायकं ।। ज्ञान-मात्रेण देवशि ! सिद्धिमाप्नोति निश्चितं। यक्षिणि स्वयमायाति, कवच-ज्ञान-मात्रतः ।। सर्वत्र दुर्लभं देवि ! डामरेषु प्रकाशितं। पठनात् धारणान्मर्त्यो, यक्षिणी-वशमानयेत् ।। विनियोगः- ॐ अस्य श्रीयक्षिणी-कवचस्य श्री गर्ग ऋषिः, गायत्री छन्दः, श्री अमुकी यक्षिणी देवता, साक्षात् सिद्धि-समृद्धयर्थे पाठे विनियोगः। ऋष्यादिन्यासः- श्रीगर्ग ऋषये नमः शिरसि, गायत्री छन्दसे नमः मुखे, श्री रतिप्रिया यक्षिणी देवतायै नमः हृदि, साक्षात् सिद्धि-समृद्धयर्थे पाठे विनियोगाय नमः सर्वांगे। ।। मूल पाठ ।। शिरो मे यक्षिणी पातु, ललाटं यक्ष-कन्यका। मुखं श्री धनदा पातु, कर्णौ मे कुल-नायिका ।। चक्षुषी वरदा पातु, नासिकां भक्त-वत्सला। केशाग्रं पिंगला पातु, धनदा श्रीमहेश्वरी ।। स्कन्धौ कुलालपा पातु, गलं मे कमलानना। किरातिनी सदा पातु, भुज-युग्मं जटेश्वरी ।। विकृतास्या सदा पातु, महा-वज्र-प्रिया मम। अस्त्र-हस्ता पातु नित्यं, पृष्ठमुदर-देशकम् ।। भेरुण्डा माकरी देवी, हृदयं पातु सर्वदा। अलंकारान्विता पातु, नितम्ब-स्थलं दया ।। धार्मिका गुह्यदेशं मे, पाद-युग्मं सुरांगना। शून्यागारे सदा पातु, मन्त्र-माता-स्वरुपिणी ।। निष्कलंका सदा पातु, चाम्बुवत्यखिलं तनुं। प्रान्तरे धनदा पातु, निज-बीज-प्रकाशिनी ।। लक्ष्मी-बीजात्मिका पातु, खड्ग-हस्ता श्मशानके। शून्यागारे नदी-तीरे, महा-यक्षेश-कन्यका।। पातु मां वरदाख्या मे, सर्वांगं पातु मोहिनी। महा-संकट-मध्ये तु, संग्रामे रिपु-सञ्चये ।। क्रोध-रुपा सदा पातु, महा-देव निषेविका। सर्वत्र सर्वदा पातु, भवानी कुल-दायिका ।। इत्येतत् कवचं देवि ! महा-यक्षिणी-प्रीतिवं। अस्यापि स्मरणादेव, राजत्वं लभतेऽचिरात्।। पञ्च-वर्ष-सहस्राणि, स्थिरो भवति भू-तले। वेद-ज्ञानी सर्व-शास्त्र-वेत्ता भवति निश्चितम्। अरण्ये सिद्धिमाप्नोति, महा-कवच-पाठतः। यक्षिणी कुल-विद्या च, समायाति सु-सिद्धदा।। अणिमा-लघिमा-प्राप्तिः सुख-सिद्धि-फलं लभेत्। पठित्वा धारयित्वा च, निर्जनेऽरण्यमन्तरे।। स्थित्वा जपेल्लक्ष-मन्त्र मिष्ट-सिद्धिं लभेन्निशि। भार्या भवति सा देवी, महा-कवच-पाठतः।। ग्रहणादेव सिद्धिः स्यान्, नात्र कार्या विचारणा ।। ।। ॐ तत्सत ।। Guleria FB Contact Yakshini Yogini FB Apsara Mantra Yogini Mantra Das Mahavidhya Inder Dev Nagini Mantra Kundalini Mantra Mantra Knowledge



