चण्डवेगा) यक्षिणी साधना
(रुद्रांशसम्भूता, दिव्य-रसायन प्रदायिनी यक्षिणी)
1. तत्त्व एवं शास्त्रीय परिचय
“रुद्रांशसम्भवा शक्तिः वेगवत्यतिभैरवा ।
छण्डवेगा इति ख्याता रसायनफलदायिनी ॥”
तन्त्रशास्त्रों में छण्डवेगा यक्षिणी को रुद्र-तत्त्व से उत्पन्न,
तीव्र वेग, गुप्त गति एवं देह-संरक्षण-शक्ति से युक्त बताया गया है।
इनकी साधना देह, प्राण और रसायन-सिद्धि से सम्बन्धित मानी जाती है।
“यत्र रुद्रस्य तत्त्वं स्यात् यत्र मौनं तपो बलम् ।
तत्रैव छण्डवेगा स्यात् साधकस्य सहायिका ॥”
2. छण्डवेगा यक्षिणी का स्वरूप
“उग्ररूपां विशालाक्षीं जटामण्डलशोभिताम् ।
रात्रौ सञ्चरतीं देवीं ध्यायेत् साधक उत्तमः ॥”
शास्त्रों के अनुसार—
इनका स्वरूप उग्र किन्तु रक्षक
रात्रि में अधिक सक्रिय
वटवृक्ष, ऊँचाई एवं वायु-तत्त्व से सम्बद्ध माना गया है।
3. साधना के मन्त्र
इस साधना में दो मन्त्र हैं। साधक को इनमें से किसी एक को ग्रहण करना होता है।
मन्त्र (१): “ॐ नमश्चन्द्राद्यावा कर्णकारण स्वाहा ।”
मन्त्र (२): “ॐ नमो भगवते रुद्राय चण्डवेगिने स्वाहा ।”
“एते मन्त्राः शिवोक्ताः गुह्याः परमदुर्लभाः ।
एकमेव जपेन्मन्त्रं श्रद्धया नियमेन तु ॥”
तन्त्रशास्त्र स्पष्ट करता है कि ये दोनों मन्त्र स्वयं भगवान शंकर द्वारा कहे गए हैं।
4. साधना-स्थान एवं समय
“वटवृक्षशिरोदेशे स्थित्वा मौनसमन्वितः ।
रात्रिकाले जपं कुर्यात् छण्डवेगाप्रसिद्धये ॥”
स्थान — वटवृक्ष के ऊपर (शाखा या दृढ़ भाग पर)
अथवा किसी सुनसान कमरे मे आसान के निचे पत्ते बिछा कर भी कर मंत्र सिद्ध यन्त्र के सामने ही कर सकते है।
समय — केवल रात्रिकाल
कालावधि — लगातार तीन मास (तीन महीने)
यह साधना साहस, स्थिरता और निर्भयता की परीक्षा मानी गई है।
5. साधक के नियम
“मौनव्रती दृढचित्तो निःशङ्को भयवर्जितः ।
रुद्रतत्त्वे स्थितः साधकः फलभाग्भवति ध्रुवम् ॥”
साधक को चाहिए—
सम्पूर्ण साधनाकाल में मौन
भय, कम्पन या अस्थिरता न हो
वटवृक्ष को शिवस्वरूप मानकर सम्मान
6. साधना-विधि (क्रमबद्ध)
(1) आरम्भिक विधि
स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
रात्रि में आसन ग्रहण कर यक्षिणी यँत्र स्थापना कर के उस के सामने जाप करना होता है।
(2) मन्त्र-जप
“लक्षसंख्यां जपेन्मन्त्रं एकचित्तेन साधकः ।
नानामन्त्रप्रयोगेन सिद्धिर्नैव प्रजायते ॥”
चुने हुए एक मन्त्र का
एक लाख (1,00,000) जप
पूर्ण मौन एवं एकाग्रता के साथ
(3) काञ्जी-प्रक्षालन विधि
जप पूर्ण होने के पश्चात—
“सप्तवारं जपित्वा तु काञ्ज्या वक्त्रं विशोधयेत् ।
एषा क्रिया महागुह्या रुद्रतत्त्वप्रबोधिनी ॥”
मन्त्र को सात बार पुनः पढ़ें
कांजी (खट्टे जल) से मुख का प्रक्षालन करें
यह क्रिया देह-शुद्धि एवं रसायन-सिद्धि से जुड़ी मानी गई है।
7. साधना-अवधि
“त्रिमासं नियमेनैव रात्रौ जपसमाचरेत् ।
ततः प्रसन्ना सा देवी प्रत्यक्षं फलदा भवेत् ॥”
यही विधि तीन मास तक दोहराई जाती है
दिन में नहीं, केवल रात्रि में
8. सिद्धि-लक्षण
“देहे लाघवमुत्पन्नं स्वप्ने रुद्रदर्शनम् ।
गुप्तरसायनलाभश्च सिद्धिचिह्नं प्रकीर्तितम् ॥”
शरीर में अद्भुत शक्ति
स्वप्न या ध्यान में उग्र स्त्री-रूप दर्शन
विशेष गुप्त अनुभव
ये छण्डवेगा यक्षिणी की प्रसन्नता के संकेत हैं।
9. सिद्धि-फल
“दिव्यं रसायनं दत्त्वा देहबलप्रदायिनी ।
जरामृत्युविनाशाय छण्डवेगा प्रसीदति ॥”
तन्त्रशास्त्रों के अनुसार—
साधक को दिव्य रसायन प्राप्त होता है
देहबल, तेज और दीर्घायु में वृद्धि होती है
रोग एवं क्षय का नाश होता है
10. उपसंहार
“न साध्या दुर्बलेनैषा न च लोभवशेन तु ।
शिवभक्त्या तपोयुक्ता छण्डवेगा प्रसीदति ॥”
छण्डवेगा यक्षिणी साधना उच्चकोटि की रुद्रात्मक साधना है।
यह केवल साहसी, संयमी और नियमपालक साधक के लिए फलदायी मानी गई है।
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