जल वासिनी यक्षिणी मंत्र साधना

जलवासिनी यक्षिणी साधना
(रत्न-समृद्धि प्रदान करने वाली जल-तत्त्वाधिष्ठात्री यक्षिणी साधना)

1. यक्षिणी तत्त्व का परिचय
“यक्षिण्यः तन्त्रशास्त्रे गुप्ताः सिद्धिदायिन्यः शक्तयः स्मृताः।
न देवा न च दैत्यास्ता न च मानुषवृत्तयः ॥
पृथ्वी-जल-वायु-तेजो-तत्त्वेषु संस्थिताः ।
साधकस्य तपोबलात् जाग्रन्ति फलदायिन्यः॥”

तांत्रिक परम्परा में यक्षिणियाँ पञ्चतत्त्वाधिष्ठित सूक्ष्म शक्तियाँ मानी गई हैं।
ये साधक की श्रद्धा, जपबल एवं तत्त्व-साम्य के अनुसार प्रकट होकर फल प्रदान करती हैं।

“यक्षिण्यः सिद्धिदा प्रोक्ता योगिनां वशवर्तिनः ।
तत्त्वसंयोगसिद्ध्यर्थं साधनं तासु कीर्तितम् ॥”

जलवासिनी यक्षिणी जल-तत्त्व की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं, जिनका सम्बन्ध समुद्र, रत्न, निधि एवं जल-सम्पदा से बताया गया है।

2. जलवासिनी यक्षिणी का स्वरूप एवं स्वभाव
शास्त्रों में जलवासिनी यक्षिणी का स्वरूप नीलाभ-कान्ति, सौम्य तथा दिव्य बताया गया है।

“नीलाम्बरधरां देवीं मुक्ताहारविभूषिताम् ।
जलमध्ये स्थितां शक्तिं जलवासिनीं विचिन्तयेत् ॥”

वे समुद्र-तट, जलराशि एवं गुप्त निधियों की अधिष्ठात्री हैं।
इनका स्वभाव शान्त, गम्भीर एवं दानशील माना गया है।

3. मुख्य मन्त्र
इस साधना में निम्न मन्त्र को मुख्य एवं अपरिवर्तनीय मन्त्र कहा गया है—

मन्त्रः “ॐ भगवन् समुद्रदेहि रत्नानि जलवासो ह्रीं नमस्तुते स्वाहा।”

“अयं मन्त्रः स्मृतो मुख्यो जलतत्त्वप्रबोधकः ।
लक्षजपसमायुक्तः रत्नसिद्धिप्रदायकः ॥”
यह मन्त्र जलवासिनी यक्षिणी का आह्वान एवं स्तुति मन्त्र है।

4. साधना के लिए उपयुक्त समय एवं स्थान
“समुद्रतीरे शुद्धे देशे निशाकाले विशेषतः ।
उपविश्य स्थिरचित्तः जपं कुर्यात् विधानतः ॥”

साधना का स्थान — समुद्र तट अथवा एकांत पूजा स्थल
समय — प्रायः रात्रिकाल श्रेष्ठ माना गया है
वातावरण — शान्त, स्वच्छ एवं एकान्त

5. साधक की पात्रता एवं मानसिक अवस्था
“शुद्धचित्तो जितेन्द्रियो मौनशीलो दृढव्रतः ।
जलतत्त्वसमायुक्तः स एव फलभाग्भवेत् ॥”

साधक को चाहिए कि—
मन को शान्त एवं स्थिर रखे
लोभ, उतावलेपन एवं भय से मुक्त रहे
समुद्र के प्रति श्रद्धा और आदर-भाव रखे

6. साधना-विधि (क्रमबद्ध विवरण)
(1) पूर्व-तैयारी
साधक स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करे।
समुद्र तट पर शान्त स्थान चुनकर पूर्व या पश्चिम मुख होकर मंत्र सिद्ध यक्षिणी यँत्र स्थापित कर के उस सामने बैठे।

(2) संकल्प एवं ध्यान
“जलतत्त्वं समाश्रित्य रत्नलाभाय साधकः ।
संकल्पं मानसैः कृत्वा देवीं ध्यायेत् स्थिरो भवेत् ॥”

हृदय में जलवासिनी यक्षिणी का ध्यान करें और रत्न-लाभ का संकल्प लें।

(3) मन्त्र-जप
मुख्य मन्त्रः

“ॐ भगवन् समुद्रदेहि रत्नानि जलवासो ह्रीं नमस्तुते स्वाहा।”

“लक्षसंख्यां जपेद् मन्त्रं नियमस्थो दृढव्रतः ।
ततः प्रसन्ना सा देवी रत्नसिद्धिं प्रयच्छति ॥”

कुल एक लाख (1,00,000) मन्त्र-जप
जप निरन्तर, एकाग्रचित्त होकर किया जाए

7. प्रकट-लक्षण एवं सिद्धि-संकेत
“जलतरङ्गे विशेषो वा सुगन्धिर्हृदि जायते ।
स्वप्ने रत्नप्रदर्शनं सिद्धिचिह्नं प्रकीर्तितम् ॥”

जल में असामान्य शान्ति या तरंग
मन में आनन्द एवं शान्ति
स्वप्न या ध्यान में रत्न-दर्शन ये सभी सिद्धि-संकेत माने गए हैं।

8. सिद्धि-फल
“उत्तमानि च रत्नानि देवी ददाति साधके ।
समृद्धिर्धनलाभश्च जलप्रसादात् प्रजायते ॥”

तंत्रशास्त्रों के अनुसार—
जलवासिनी यक्षिणी प्रसन्न होकर साधक को उत्तम एवं दुर्लभ रत्न प्रदान करती हैं
साधक के जीवन में धन, सौभाग्य एवं स्थायित्व आता है

9. उपसंहार
“गुप्तं गुह्यतरं तन्त्रं जलतत्त्वसमन्वितम् ।
श्रद्धया नियमेनैव फलदं सिद्धिदायकम् ॥”

जलवासिनी यक्षिणी साधना तत्त्व-साम्य, श्रद्धा और धैर्य की साधना है।
जो साधक नियमपूर्वक, निःस्वार्थ भाव से इस साधना को करता है, वही इसके वास्तविक फल का अधिकारी बनता है।
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Published by Yakshnidevi

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