विभ्रमा यक्षिणी साधना
(काम्य फल प्रदान करने वाली रहस्यमयी यक्षिणी साधना)
1. यक्षिणी तत्त्व का परिचय
“यक्षिण्यः तन्त्रशास्त्रे गुप्ताः सिद्धिदायिन्यः शक्तयः कथिताः।
न देवा न च दैत्यास्ता, न च मानुषवृत्तयः।
अन्तराले स्थिता शक्तयः साधकस्य संकल्पेन जाग्रति।”
“न देवा न च गन्धर्वा न राक्षसगणा अपि ।
यक्षिण्यः सिद्धिदा प्रोक्ता योगिनां वशवर्तिनः ॥”
विभ्रमा नाम यक्षिणी विशेषतः वाणी, संकल्प, आकर्षण तथा मनोविभ्रम-नाश की अधिष्ठात्री मानी गई है।
तांत्रिक परम्परा में यक्षिणियाँ सिद्धि-प्रदायिनी दिव्य शक्तियाँ मानी गई हैं। ये न तो पूर्णतः देववर्गीय हैं और न ही राक्षसी, बल्कि मध्यवर्ती सूक्ष्म शक्तियाँ हैं, जो साधक की चेतना, इच्छा-शक्ति और तप के अनुसार प्रकट होकर कार्य करती हैं।
विभ्रमा यक्षिणी इन्हीं विशिष्ट यक्षिणियों में से एक हैं, जिनका स्वभाव तीव्र, आकर्षक तथा भ्रम-नाशक माना गया है। ये साधक को उसके अभीष्ट कार्य में सहायता प्रदान करती हैं और मन, वाणी व संकल्प को प्रभावशाली बनाती हैं।
2. विभ्रमा यक्षिणी का स्वरूप एवं स्वभाव
शास्त्रों में विभ्रमा का स्वरूप सौम्य-उग्र मिश्रित बताया गया है।
वह मृदु हास्ययुक्ता, नेत्रों में तेज तथा शरीर में दिव्य कान्ति धारण करती हैं।
“श्वेताभरणसंयुक्तां तेजोमण्डलशोभिताम् ।
विभ्रामिनीं महाशक्तिं भावयेच्चित्तमध्यगाम् ॥”
उनका प्राकट्य केवल निर्भीक, एकाग्र एवं नियमपालक साधक के समक्ष ही होता है।
शास्त्रों के अनुसार विभ्रमा यक्षिणी का स्वरूप तेजस्विनी, सौम्य तथा आकर्षणयुक्त बताया गया है। वे साधक के मन के भय, संशय और चंचलता को दूर कर उसे एकाग्रता प्रदान करती हैं।
इनकी साधना साहस, स्थिर मन और पूर्ण विश्वास की परीक्षा लेती है। भयभीत या संशयग्रस्त साधक के समक्ष वे प्रकट नहीं होतीं।
3. मुख्य मन्त्र
इस साधना में निम्न मन्त्र को मुख्य एवं अपरिवर्तनीय मन्त्र माना गया है—
मन्त्रः
“ॐ ह्रीं विभ्रमरूपे विभ्रमं कुरु कुरु ऐह्य हि भगवती स्वाहा ।”
“अयं मन्त्रः स्मृतो मुख्यो यक्षिणी-वश्यकारकः ।
श्रद्धया जपमात्रेण सिद्धिं ददाति निश्चयम् ॥”
यह मन्त्र विभ्रमा यक्षिणी का आह्वान, स्तुति तथा आज्ञा—तीनों का समन्वय है।
4. साधना के लिए उपयुक्त समय एवं स्थान
“अमावास्यां चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे विशेषतः ।
श्मशाने निर्जने देशे साधनं सिद्धिदं भवेत् ॥”
विभ्रमा यक्षिणी की साधना रात्रिकालीन मानी गई है।
अमावस्या, कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी अथवा किसी विशेष तांत्रिक रात्रि को यह साधना श्रेष्ठ मानी जाती है।
स्थान के रूप में श्मशान, एकान्त निर्जन भूमि या सिद्ध-पीठ के समीप का क्षेत्र बताया गया है।
साधना स्थल शान्त, निर्भय एवं बाह्य व्यवधानों से मुक्त होना चाहिए।
5. साधक की पात्रता एवं मानसिक अवस्था
“ब्रह्मचारी जितक्रोधो मौनव्रतपरायणः ।
न भीतः न च सन्देही साधनायां प्रशस्यते ॥”
साधक को चाहिए कि—
वह ब्रह्मचर्य, मौन और संयम का पालन करे।
साधनाकाल में मन को स्थिर रखे और भय, संदेह या उत्सुकता से विचलित न हो।
किसी भी प्रकार का डर, आकस्मिक ध्वनि या अनुभूति होने पर भी साधना न छोड़े।
ग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है कि डर ही साधना का सबसे बड़ा विघ्न है।
6. साधना-विधि (क्रमबद्ध विवरण)
(1) पूर्व-तैयारी
साधना से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मौन धारण करते हुए साधना-स्थल पर पूर्व या उत्तर मुख होकर यन्त्र स्थापना कर के आसन लगाएँ।
(2) आसन एवं संकल्प
साधक स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करे।
पूर्व या उत्तर मुख होकर आसन ग्रहण करे।
“आसने स्थापयेत् देहं स्थिरचित्तो जितेन्द्रियः ।
संकल्पं मानसैः कुर्यात् सिद्ध्यर्थं यक्षिणीप्रिये ॥”
हृदय में विभ्रमा यक्षिणी को प्रसन्न करने तथा अपने मनवांछित फल की भावना रखें। संकल्प मानसिक रूप से ही करें।
(3) मन्त्र-जप
॥ ध्यान-श्लोकः ॥
“ध्यानं करोतु साधकः शान्तचित्तः सुसंयतः ।
विभ्रामिनीं महाशक्तिं काम्यसिद्धिप्रदायिनीम् ॥”
मुख्य मन्त्रः
“ॐ ह्रीं विभ्रमरूपे विभ्रमं कुरु कुरु ऐह्य हि भगवती स्वाहा ।”
उपर्युक्त मुख्य मन्त्र का जप एकाग्रचित्त होकर आरम्भ करें।
जप संख्या निश्चित नहीं बताई गई है।
मन्त्र-जप तब तक करें, जब तक विभ्रमा यक्षिणी की उपस्थिति का अनुभव या संकेत प्राप्त न हो जाए।
(4) मौन एवं एकाग्रता
पूरी साधना मौन में की जाती है। बीच-बीच में इधर-उधर देखना, उठना या भय से मन्त्र रोकना निषिद्ध है।
7. हवन-विधि
“घृतेन गुग्गुलेनैव दशांशं होममाचरेत् ।
मन्त्रेणैव विधानज्ञः सिद्धिर्भवति निश्चितम् ॥”
साधना-काल में या साधना के उपरान्त—
गूगल (गुग्गुल) और शुद्ध घी से हवन किया जाता है।
जप संख्या का दशांश हवन करना अनिवार्य बताया गया है।
हवन करते समय उसी मुख्य मन्त्र से आहुति दी जाती है—
ॐ ह्रीं विभ्रमरूपे विभ्रमं कुरु कुरु ऐह्य हि भगवती स्वाहा ।
8. प्रकट-लक्षण एवं सिद्धि-संकेत
“गन्धः शब्दोऽथ वायुः स्यात् स्वप्नो वा हृदि भाषणम् ।
एतानि देविचिह्नानि भयहीनः समाचरेत् ॥”
जब विभ्रमा यक्षिणी प्रसन्न होती हैं, तब साधक को—
वायु में परिवर्तन, सुगन्ध, स्वप्न, आभास या मानसिक संवाद
जैसे संकेत प्राप्त हो सकते हैं।
इन संकेतों से घबराने के बजाय साधक को स्थिर रहना चाहिए।
9. सिद्धि-फल
“वाक्सिद्धिर्मनसः सिद्धिः काम्यकार्यप्रसाधनम् ।
यक्षिणीप्रसादेन साधको विजयी भवेत् ॥”
इस विधि से साधना करने पर विभ्रमा यक्षिणी साधक से संतुष्ट होकर—
मनवांछित कार्यों में सहायता, वाणी-सिद्धि, आकर्षण-शक्ति,
तथा इच्छित फल प्रदान करती हैं।
शास्त्रों में कहा गया है कि यदि साधक नियमपूर्वक और श्रद्धा से साधना करे, तो विभ्रमा यक्षिणी शीघ्र प्रसन्न होती हैं।
10. उपसंहार
“गुप्तं गुह्यतरं तन्त्रं न प्रकाश्यं कदाचन ।
श्रद्धावान् नियमस्थश्च स एव फलभाग्भवेत् ॥”
विभ्रमा यक्षिणी साधना कोई सामान्य प्रयोग नहीं, बल्कि साहस, धैर्य और पूर्ण श्रद्धा की परीक्षा है। जो साधक भय, लोभ और उतावलेपन से ऊपर उठकर इस साधना को करता है, वही इसका वास्तविक फल प्राप्त करता है।
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