सामान्य यक्षिणी साधना – यज्ञ विधान दिक्षा

यक्षिणी दिक्षा व हवन यज्ञ

यक्षिणी साधना अत्यन्त ही सरल पुर्णतः सात्विक व सुरक्षित साधना होती है ।
जिसे   कोई भी साधक सक्षम गुरु से विधिवत दीक्षा लेकर गुरु के निर्देशानुसार गुरु के सानिध्य में आसानी से संपन्न कर सकता है, इस साधना के सिद्ध हो जाने पर अभीष्ट यक्षिणी द्वारा अपनी उपस्थिति का आभास बनाए रखा जाता है, तथा केवल शूक्ष्म रूप से साधक के स्वसम्बन्धी कार्यों में निरन्तर सहयोग व मार्गदर्शन करती रहती है ।
पत्नी व प्रेमिका के रूप में यह साधना सम्पन्न किये जाने पर बहूत ज्यादा समय लगता है इसके लिये तत्रं की गहरी जानकारी तथा कुंडलिनी जाग्रत साधक जो शिव लिंग शक्ति  का  तथा लम्बी  तपस्या का बहूत ही गहरा अनुभव हो वही कर सकता है।

तथा माता व बहन के रूप में यह साधना किये जाने पर पुर्णतः सात्विक, सुरक्षित व आर्थिक संसाधनों की प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ फलदायिनी साधना होती है ।

इस साधना के लाभ :- यह दीक्षा लेकर साधना करने से साधक को साधनाकाल में अभीष्ट यक्षिणी का केवल शूक्ष्म रूप से अनुभव होता है,कुछ भी दिखाई या सुनाई नहीं देता है, केवल परछाई आदि के रूप में आभास हो जाना तक ही सम्भावित होता है !

तथा भविष्य में भी साधक की इच्छा व आवश्यकतानुसार शूक्ष्म अनुभूतियों के साथ अदृश्य रूप में सामाजिक, धर्म व नैतिक सीमाओं के अन्दर रहते हुए यक्षिणी के अधिकार क्षेत्र के अधीन अनेक प्रकार से कार्य, व्यवसाय, रोजगार, धनार्जन आदि के लिए नवीन व सुदृढ़ मार्गों व कारणों का निर्माण होता है, अनेक प्रकार से धनार्जन के मार्ग प्रशस्त होकर आर्थिक क्षमताओं की वृद्धि व जीवन में सभी प्रकार से धन व भौतिक ऐश्वर्यों की पूर्णता के साथ सहयोग प्राप्त होता है !

स्पष्ट रूप से यक्षिणियों व देवी देवताओं के दर्शन उसी साधक को होते हैं जो ज्यादा ऊर्जावान होते हैं जो लोक कल्याण व .शिव सनातन धर्म रक्षा व प्रचारक होते हैं, जो अपने लिये नहीं शिव जी के लिये ही जीवन बलिदान करने के लिये तैयार रहते हैं।

यह साधना पूर्ण रूप से केवल भौतिक साधना  होती है, यह साधना शिव धर्म के प्रचार प्रसार, आध्यात्मिक या आत्मोत्थान के मार्ग को आगे बढ़ाने की बहुत ही अच्छा रास्ता है परन्तु मंजिल नहीं है, मंजिल तो सहस्रार चक्र में बैठे शिव जी ही हैं !

इस साधना के विशेष लाभ :-
सभी साधक यक्षिणी को प्रत्यक्ष सिद्ध करना चाहते हैं, किन्तु प्रत्यक्ष सिद्ध करने के लिए अत्यन्त जटिल योग्यताओं की आवश्यकता होती है जिसे प्रत्येक साधक पूर्ण नहीं कर पाता है जिस कारण साधना में असफल होने की संभावनाएं बनी रहती हैं ।

किन्तु यह 11/21 दिवसीय सामान्य यक्षिणी साधना जो कि अत्यन्त सरल होती है इसको सम्पन्न कर लेने से यक्षिणी का शूक्ष्म रूप में अनुभव हो जाता है व उस यक्षिणी से सम्बन्धित कार्यों में साधक को सफलता व शूक्ष्म रूप से सहयोग व मार्गदर्शन मिलने लग जाता है।
इस साधना के प्रभाव से साधक की वह आवश्यकताएं पूर्ण होने के साथ ही आत्मविश्वास व उत्साह बढ़ जाने पर साधक भविष्य में प्रत्यक्षिकरण साधना की योग्यता को प्राप्त कर इस साधना को ही प्रत्यक्ष यक्षिणी सिद्धि में परिवर्तित कर सकता है । यह दीक्षा प्राप्त कर लेने के उपरान्त साधक दीक्षा के समय प्राप्त हुए मन्त्र एवं साधना विधान के अनुसार श्री ज्योतिर्मणि पीठ पर प्रकृति द्वारा निर्मित अनुकूल वातावरण में निर्बाध रहकर यह साधना हमारे निर्देशन में संपन्न कर सकते हैं ।

साधना :- केवल पद्मावती, चन्द्रिका, रतिप्रिया, सुरसुन्दरी, मनोहारिणी, कामेश्वरी, अनुरागिनी व कनकावती में से साधक की इच्छा अथवा आवश्यकतानुसार केवल किसी एक यक्षिणी की ही दीक्षा प्रदान कर साधना संपन्न कराई जा सकती है, दीक्षा के सैद्धान्तिक नियमानुसार एक बार में एक से अधिक दीक्षा नहीं ली जा सकती हैं !
अनिवार्य योग्यताएं :- यह साधना अत्यन्त ही सरल होती है जिसे कोई भी साधक गुरु से विधिवत दीक्षा लेकर गुरु के सानिध्य में आसानी से संपन्न कर सकता है, तथा इस साधना में निम्नलिखित नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करने की क्षमता रखने वाले सभी पुरुष साधक सम्मिलित हो सकते हैं !
साधनाकाल में एक से डेढ़ घंटे तक बिना हिले डुले एक ही स्थिर आसन में बैठने में अभ्यस्त हो ! साधनाकाल में एक से डेढ़ घंटे तक मन की एकाग्रता से रहने में अभ्यस्त हो !
साधनाकाल में कायिक वाचिक मानसिक रूप से ब्रहमचर्य से युक्त रहने में सक्षम हो ! साधनाकाल में कायिक वाचिक मानसिक रूप से वीरभाव (निर्भयता व पुरुषार्थ) की भावना से युक्त हो !
साधनाकाल में कायिक वाचिक मानसिक रूप से मार्गदर्शक गुरु के प्रति आस्थावान हो ! साधनाकाल में साधना की पूर्णता हेतु गुरु द्वारा प्रदत्त अनिवार्य निर्देशों व साधना के नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करने की क्षमता से युक्त हो !
साधनाकाल के लिए अनिवार्य व्यवहारिक नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करने की क्षमता से युक्त हो ! व्यवहारिक नियमों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें !
इस साधना में उपरोक्त लिखी गई सभी “अनिवार्य योग्यताओं” का पूर्ण होना होता है।

साधना अवधि :- नियमानुसार यह साधना “मन्त्र जप व यज्ञ विधान” द्वारा पांच (5) दिवस तथा केवल “मन्त्र जप विधान” द्वारा इकत्तीस (31) दिवस में विधिवत् सम्पन्न होती है !
किन्तु उपरोक्त “योग्यता” के लिए लिखे गए निर्देशों व साधना के नियमों में समझौतावादी, स्वेच्छाचारी साधक के लिए यह साधना अवधि अनन्त काल तक की भी हो सकती है !
क्योकिं ब्रह्माण्ड के सारे मंत्र तथा अाशिर्वाद की ऊर्जा शिव जी द्वारा ही उत्पन्न हुई हैं तथा दुरूपयोग होने के चलते शिव जी द्वारा कीलित कर दी गई है ,मंत्रो द्घारा  उत्किलन करने बाद भी इन का इतना प्रभाव नहीं होता जितना होना चाहिऐ  ,उत्किलन मंत्र भी तभी ठीक तरीके से कार्य करते है जब साधक का उदेश्य स्पष्ट हो ,जिसका उत्किलन तभी होता जब साधक का लक्ष्य स्पष्ट हो कि वह अपना जीवन शिव धर्म का प्रचार व धर्म का रास्ता पर ही चले गा।
अब धर्म क्या है ? धर्म कायरता नहीं सिखाता ,धर्म मर मिटना सिखाता है ,जिस शिव जी सुन्दर शरीर दिया है ,सर्य ,पृथ्वी दी रहने के लिये भोजन ,पेड पौधे सभी कुछ दिया है ,उसके लिये हम क्या कर रहें ???
आपको अपनी दीक्षा/साधना सामग्री

Published by Yakshnidevi

Yakshini Devi Mantra Hawan Yagna Fire Worship 🔥Online.

One thought on “सामान्य यक्षिणी साधना – यज्ञ विधान दिक्षा

  1. GULERIA SADHGURU

    Table

    No. Name Descriptions
    -1- यक्षिणी देवी यक्षिणी मंत्र साधना
    2- Sawarn Yakshini स्वर्ण यक्षिणी साधना
    3- SurSundri Yakshini सूरसुन्दरी यक्षिणी मंत्र साधना
    4- AnuRagini Yakshini मंत्र साधना
    5- KanakVati Yakshini कनकवती मंत्र साधना
    6- Manoharini Yakshini मनोहरिणी मंत्र साधना
    7- Padmini Yakshini पदमिनी मंत्र साधना
    8- Kameshwari Yakshini कामेश्वरी यक्षिणी मंत्र साधना
    -9- Nati Yakshini मंत्र साधना
    10- RatiPriya Mantra रतिप्रिया मंत्र साधना
    11- Yaksha Mantra यक्ष मंत्र साधना
    12– Yakshini Mantra यक्षिणी मंत्र साधना

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